विधानसभा के निर्देशों की अनदेखी पड़ी भारी, पांच दिन में जवाब नहीं तो बढ़ सकती हैं अधिकारियों की मुश्किलें
Kanpur । चर्चित परमट स्कूल विवाद और आर्यनगर के विधायक अमिताभ बाजपेयी की ओर से उठाए गए विशेषाधिकार हनन प्रकरण में विधानसभा सचिवालय ने कड़ा रुख अपना लिया है। समय सीमा समाप्त होने के बावजूद रिपोर्ट न भेजने पर कानपुर के जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर को दोबारा नोटिस जारी करते हुए पांच कार्यदिवस के भीतर तथ्यात्मक आख्या उपलब्ध कराने का अंतिम निर्देश दिया गया है।
विधानसभा के इस कदम से प्रशासनिक महकमे में हलचल मच गई है।जानकारी के अनुसार, परमट स्कूल मामले को लेकर विधायक अमिताभ बाजपेयी ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष विशेषाधिकार हनन का प्रार्थना पत्र दिया था। शिकायत को गंभीर मानते हुए विधानसभा सचिवालय ने पहले ही जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर से 15 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। लेकिन तय समय बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन की ओर से कोई जवाब या तथ्यात्मक रिपोर्ट विधानसभा को नहीं भेजी गई।
रिपोर्ट न मिलने पर विधानसभा सचिवालय ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना। इसके बाद 24 जून को दोनों अधिकारियों को रिमाइंडर नोटिस जारी किया गया। पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया कि पांच कार्यदिवस के भीतर हर हाल में तथ्यात्मक रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए।
।साथ ही संकेत दिए गए कि यदि इस बार भी जवाब नहीं मिला तो मामले में आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
विधायक ने उठाए प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल
विधायक अमिताभ बाजपेयी ने कहा कि विधानसभा जैसी सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था द्वारा मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध न कराना बेहद गंभीर विषय है।
उनका कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि विधायिका की गरिमा की अनदेखी भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन का रवैया जनप्रतिनिधियों के प्रति उदासीन और जवाबदेही से बचने वाला दिखाई देता है।
अब सबकी नजर प्रशासन के जवाब पर
विधानसभा सचिवालय की ओर से जारी अंतिम नोटिस के बाद अब निगाहें कानपुर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर रिपोर्ट भेजी जाती है तो विधानसभा मामले की आगे की प्रक्रिया शुरू करेगी।
वहीं, यदि इस बार भी रिपोर्ट नहीं पहुंची तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होने के साथ उनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। ऐसे में परमट स्कूल विवाद अब केवल स्थानीय प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि विधानसभा की निगरानी में पहुंचने के कारण राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन गया है।


