दो माह में आठ टन से ज्यादा प्लास्टिक निकाला, पांच ब्लॉकों के 40 टन कचरे का हो रहा निस्तारण
Kanpur । नहर में बहकर आने वाला प्लास्टिक अब बिल्हौर देहात के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि कमाई का जरिया बन गया है। पानी में बहता कचरा आगे जाने से पहले ही ‘ट्रैश बूम’ में फंस जाता है। इसके बाद इसे प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट में पहुंचाकर अलग-अलग प्रक्रिया से गुजारा जाता है। महज दो महीने में नहर से आठ टन से अधिक प्लास्टिक निकाला जा चुका है।

वहीं पांच विकासखंडों की ग्राम पंचायतों से करीब 40 टन प्लास्टिक इस यूनिट तक पहुंच चुका है।स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) फेज-2 के तहत बिल्हौर देहात को कचरा प्रबंधन के इंटीग्रेटेड मॉडल के रूप में विकसित किया गया है। पहले सड़क किनारे कूड़े के ढेर और प्लास्टिक से नालियां चोक होने की समस्या आम थी। अब घरों और गांवों से निकलने वाले प्लास्टिक को एकत्र करने से लेकर उसके निस्तारण तक की व्यवस्था बनाई गई है।

नहर में जाल की तरह काम करता है ट्रैश बूम
अलियापुर नहर में जून 2026 में स्वच्छ प्रवाह संस्था और प्लास्टिक फिशर्स के सहयोग से ट्रैश बूम लगाया गया। यह पानी के साथ बहने वाले प्लास्टिक को आगे जाने से रोककर एक स्थान पर जमा करता है। सामान्य दिनों में रोज करीब 150 किलो प्लास्टिक एकत्र हुआ। दो माह में आठ टन से अधिक प्लास्टिक निकाला गया। नहर का जलस्तर बढ़ने पर इसे फिलहाल हटा दिया गया है। पानी कम होने पर फिर स्थापित किया जाएगा।
16 लाख से तैयार हुई कचरा प्रबंधन यूनिट
प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट के लिए 16 लाख रुपये मिले। यहां फटका मशीन से प्लास्टिक की सफाई, बेलिंग मशीन से दबाकर पैकिंग और जरूरत के अनुसार श्रेडिंग की व्यवस्था है। ककवन, चौबेपुर, शिवराजपुर, कल्याणपुर और बिल्हौर विकासखंडों की ग्राम पंचायतों को यूनिट से जोड़ा गया है।
कचरा बेचा तो खाते में आए 72 हजार
ग्राम पंचायत ने स्थानीय कबाड़ियों को भी मॉडल से जोड़ा है। एकत्र प्लास्टिक की बिक्री से अब तक 72 हजार रुपये से अधिक पंचायत की स्वयं की आय (ओएसआर) में जमा हो चुके हैं। यानी प्लास्टिक हटाने के साथ पंचायत को आर्थिक लाभ भी मिल रहा है।
गोबर से खाद, गांव में बढ़ी आय
गीले कचरे और गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तथा नाडेप के जरिए खाद बनाई जा रही है। इसे 15 से 20 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है। डीपीआरओ मनोज कुमार ने बताया कि मॉडल में कचरे को बोझ मानने के बजाय उसके वैज्ञानिक प्रबंधन और आय सृजन का रास्ता तैयार किया गया है। सफल प्रयोगों को अन्य ग्राम पंचायतों में भी स्थानीय जरूरत के अनुसार लागू किया जा सकता है।


