Kanpur। मौसम में हो रहे बदलाव को देखते हुए आलू की फसल में झुलसा रोग के प्रकोप की आशंका जताई गई है। चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के साकभाजी विज्ञान विभाग के प्रभारी डॉ. केशव आर्य ने बताया कि वर्तमान परिस्थितियाँ आलू में रोग फैलने के लिए अनुकूल हैं, ऐसे में किसानों को पहले से ही सतर्क होकर फसल की निगरानी करनी चाहिए।

आलू विशेषज्ञ डॉ. अजय यादव ने कहा कि केंद्रीय एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलू किसानों की प्रमुख फसल है। यदि समय रहते फसल की देखभाल और रोग प्रबंधन नहीं किया गया तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। खड़ी फसल में झुलसा रोग का प्रभाव अधिक होता है, इसलिए रोकथाम के उपाय पहले से अपनाना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि रोग नियंत्रण के लिए सायमोक्सनिल एवं मैंकोजेब दवा की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। इसके विकल्प के रूप में एजोक्सीस्ट्रॉबिन एवं टीनूकोनाजोल दवा की 1 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव भी लाभकारी है।
डॉ. यादव ने बताया कि आलू की पत्तियों पर दिखाई देने वाले छोटे-छोटे धब्बे कई बार पोषक तत्वों की कमी जैसे प्रतीत होते हैं, जिसे मैनी लीफ कॉम्प्लेक्स रोग कहा जाता है। इसके नियंत्रण हेतु क्लोरोथेलोनील दवा की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
साथ ही आयरन, तांबा, जिंक, कैल्शियम, मोलिब्डेनम,बोरान एवं क्लोरीन युक्त बहु सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग लाभकारी होता है। प्रति एकड़ एक किलोग्राम मात्रा पर्याप्त रहती है।किसानों से अपील की गई है कि वे समय पर उचित उपाय अपनाकर आलू की फसल को झुलसा रोग से सुरक्षित रखें।


